Thursday, November 5, 2026
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Homeउत्तर प्रदेशमसौली में दरफ्शा बानो का पहला रोज़ा, रोज़ा कुशाई आयोजित

मसौली में दरफ्शा बानो का पहला रोज़ा, रोज़ा कुशाई आयोजित

ABN NEWS 247/मोहम्मद फैसल सिद्दीकी/मसौली बाराबंकी। पवित्र माह रमज़ान के पहले अशरे में कस्बा मसौली निवासी शादाब ख़ान की 12 वर्षीय पुत्री दरफ्शा बानो ने अपने जीवन का पहला रोज़ा रखा रोज़ा इफ्तार के दौरान दरफ्शा बानो ने मुल्क में अमन-चैन और भाईचारे की दुआ की जिससे माहौल पूरी तरह रूहानी और भावनात्मक हो उठा। दरफ्शा बानो के पहले रोज़े की खुशी में शादाब ख़ान ने रोज़ा कुशाई (इफ्तार पार्टी) का आयोजन किया जिसमें मोहल्ले और गांव के तमाम रोजेदारों ने शिरकत कर सामूहिक रूप से रोज़ा इफ्तार किया। इस मौके पर सभी ने देश में शांति, सौहार्द और भाईचारे की कायम रहने की दुआएं मांगीं। शादाब ख़ान ने बताया कि इस्लाम धर्म में रमज़ान के पवित्र महीने में रोज़ा रखना हर बालिग समझदार और शारीरिक रूप से सक्षम मुसलमान पुरुष व महिला पर फ़र्ज़ (अनिवार्य) है। रोज़ा केवल भूखे-प्यासे रहने का नाम नहीं बल्कि यह आत्म विश्वास अनुशासन सब्र और जरूरतमंदों के प्रति संवेदना विकसित करने का माध्यम भी है। उन्होंने आगे बताया कि गंभीर रूप से बीमार व्यक्ति गर्भवती महिलाएं या मासिक धर्म के दौरान महिलाएं रोज़े से छूट पा सकती हैं लेकिन बाद में वे रोज़ों की क़ज़ा (पूरा) कर सकती हैं। दरफ्शा बानो के पहले रोज़े की इस पहल को मोहल्ले में सराहा गया और लोगों ने बच्ची के उज्ज्वल भविष्य के लिए दुआएं कीं।

रोज़ा कुशाई (इफ्तार पार्टी) का आयोजन

दरफ्शा बानो के पहले रोज़े की खुशी में शादाब ख़ान ने रोज़ा कुशाई (इफ्तार पार्टी) का आयोजन किया। इस अवसर पर मोहल्ले और गांव के तमाम रोजेदारों ने शिरकत कर सामूहिक रूप से रोज़ा इफ्तार किया। सभी ने देश में शांति, सौहार्द और भाईचारे के कायम रहने की दुआएं मांगीं।

रमज़ान में रोज़े की अहमियत

शादाब ख़ान ने बताया कि इस्लाम धर्म में रमज़ान के पवित्र महीने में रोज़ा रखना हर बालिग, समझदार और शारीरिक रूप से सक्षम मुसलमान पुरुष व महिला पर फ़र्ज़ (अनिवार्य) है। रोज़ा केवल भूखे-प्यासे रहने का नाम नहीं, बल्कि यह आत्मविश्वास, अनुशासन, सब्र और जरूरतमंदों के प्रति संवेदना विकसित करने का माध्यम भी है।

उन्होंने यह भी बताया कि गंभीर रूप से बीमार व्यक्ति, गर्भवती महिलाएं या मासिक धर्म के दौरान महिलाएं रोज़े से छूट पा सकती हैं, लेकिन बाद में वे रोज़ों की क़ज़ा (पूरा) कर सकती हैं।

मोहल्ले में खुशी का माहौल

दरफ्शा बानो के पहले रोज़े की इस पहल को मोहल्ले में खूब सराहा गया। लोगों ने बच्ची के उज्ज्वल भविष्य और अच्छी सेहत के लिए दुआएं कीं।

 

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