मीरजापुर। प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद के सदस्य संजीव सान्याल ने मीरजापुर दौरे के दूसरे दिन लोहिया तालाब स्थित डैफोडिल्स पब्लिक स्कूल में आयोजित विचार गोष्ठी में आईएनएसवी कौंडिन्य के निर्माण, उसके पीछे किए गए शोध और ऐतिहासिक समुद्री यात्रा के अनुभव साझा किए। कार्यक्रम में नगर पालिका परिषद मीरजापुर के अध्यक्ष श्यामसुंदर केशरी, विद्यालय के डायरेक्टर अमरदीप सिंह, अपराजिता सिंह सहित कई लोग मौजूद रहे। विद्यालय की छात्राओं ने स्वागत गीत और विभिन्न विषयों पर प्रस्तुतियां देकर अतिथि का स्वागत किया। इस दौरान छात्राओं ने संजीव सान्याल से संवाद भी किया।
आईएनएसवी कौंडिन्य के निर्माण की कहानी
कार्यक्रम में संजीव सान्याल ने प्रोजेक्टर के माध्यम से आईएनएसवी कौंडिन्य के निर्माण की पूरी प्रक्रिया के बारे में जानकारी दी। उन्होंने बताया कि लंबे समय से यह समझने का प्रयास किया जा रहा था कि लगभग दो हजार वर्ष पहले भारतीय नाविक बिना आधुनिक तकनीक, धातु की कीलों और अन्य आधुनिक संसाधनों के समुद्र में लंबी यात्राएं कैसे करते थे। प्राचीन जहाजों के पर्याप्त भौतिक अवशेष उपलब्ध नहीं होने के कारण इस तकनीक को दोबारा समझना चुनौतीपूर्ण था। शोधकर्ताओं ने इस दिशा में प्राचीन सिक्कों पर बने जहाजों के चित्र, अजंता की गुफाओं में मौजूद कलाकृतियां और देश के अलग-अलग हिस्सों में आज भी प्रचलित पारंपरिक नौका निर्माण तकनीकों का अध्ययन किया।
बिना कील और धातु के तैयार हुआ जहाज
संजीव सान्याल के अनुसार प्राचीन भारतीय नौका निर्माण तकनीक की सबसे खास बात यह थी कि लकड़ी के तख्तों को धातु की कीलों से जोड़ने के बजाय रस्सियों के माध्यम से आपस में बांधा जाता था। नारियल के रेशों से तैयार रस्सियों का इस्तेमाल तख्तों को जोड़ने के लिए किया जाता था। इसके अलावा प्राकृतिक रेजिन, कपास और तेल जैसे पारंपरिक पदार्थों की मदद से नौका को सील किया जाता था। इस तकनीक को समझने और व्यवहार में उतारने के लिए पारंपरिक नौका निर्माण से जुड़े कुशल कारीगरों की मदद ली गई। लंबे शोध और परीक्षण के बाद आईएनएसवी कौंडिन्य को तैयार किया जा सका।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सामने हुआ था परियोजना का प्रस्तुतीकरण
संजीव सान्याल ने बताया कि आईएनएसवी कौंडिन्य से जुड़ी परियोजना का प्रस्तुतीकरण प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के समक्ष भी किया गया था। परियोजना को प्रोत्साहित करते हुए प्रधानमंत्री ने हल्के-फुल्के अंदाज में कहा था कि जहाज बनाइए, लेकिन डूबना नहीं चाहिए। इसके बाद परियोजना पर काम आगे बढ़ा। लगभग दो वर्षों के परिश्रम, पारंपरिक ज्ञान, आधुनिक शोध और कई स्तरों पर परीक्षण के बाद इस प्राचीन तकनीक पर आधारित जहाज को तैयार किया गया।
पोरबंदर से मस्कट तक ऐतिहासिक समुद्री यात्रा
आईएनएसवी कौंडिन्य का नाम प्राचीन भारतीय नाविक कौंडिन्य के नाम पर रखा गया। ऐतिहासिक संदर्भों के अनुसार कौंडिन्य ने हिंद महासागर को पार कर दक्षिण-पूर्व एशिया तक समुद्री यात्रा की थी। तैयार होने के बाद आईएनएसवी कौंडिन्य ने गुजरात के पोरबंदर से ओमान के मस्कट तक समुद्री यात्रा की। इस यात्रा के दौरान दल को प्राचीन नाविकों की परिस्थितियों को करीब से समझने का अवसर मिला। संजीव सान्याल ने बताया कि जहाज मुख्य रूप से हवाओं के सहारे आगे बढ़ता था और इसमें आधुनिक जहाजों जैसी सुविधाएं उपलब्ध नहीं थीं।
सीमित संसाधनों के बीच पूरी हुई यात्रा
समुद्री यात्रा के अनुभव साझा करते हुए संजीव सान्याल ने बताया कि पीने का पानी मटकों में रखा गया था। यात्रा के शुरुआती दिनों में साथ ले जाई गई ताजी सब्जियां भी कुछ समय बाद समाप्त हो गईं। इसके बाद सीमित संसाधनों में खिचड़ी और साधारण भोजन के सहारे यात्रा आगे बढ़ाई गई। चालक दल के सदस्यों को आधुनिक जहाजों की तरह अलग-अलग सुविधाएं उपलब्ध नहीं थीं और उन्हें डेक पर ही कंबल ओढ़कर आराम करना पड़ता था। इस अनुभव ने प्राचीन भारतीय नाविकों की समुद्री यात्राओं की कठिनाइयों को समझने का एक अलग अवसर दिया।
मीरजापुर की प्राचीन नौका तकनीक का अल्फा प्रोटोटाइप
कार्यक्रम में मीरजापुर की प्राचीन नौका निर्माण तकनीक पर किए जा रहे शोध का अल्फा प्रोटोटाइप भी प्रदर्शित किया गया। पिछले लगभग एक वर्ष से मीरजापुर क्षेत्र में मौजूद पारंपरिक नौका निर्माण ज्ञान और तकनीक को समझने, उसका दस्तावेजीकरण करने तथा उसके पुनर्जीवन की दिशा में काम किया जा रहा है। यह प्रोटोटाइप इस शोध पहल का शुरुआती प्रायोगिक स्वरूप है। इसका उद्देश्य क्षेत्र में पीढ़ियों से चले आ रहे पारंपरिक कौशल को सामने लाना और भविष्य में इस पर व्यापक शोध के लिए आधार तैयार करना है।
स्थानीय कारीगरों के पारंपरिक ज्ञान का इस्तेमाल
इस पहल में स्थानीय पारंपरिक कारीगर रामबली निषाद के अनुभव और पीढ़ियों से चले आ रहे ज्ञान को आधार बनाया गया। बताया गया कि प्राचीन पद्धति के अनुरूप बिना कील और बिना धातु के उपयोग वाली तकनीक से अल्फा प्रोटोटाइप तैयार किया गया। संजीव सान्याल के मार्गदर्शन और फोर्सिस के चेयरमैन कार्तिक केशरी के प्रयासों से इस दिशा में शोध और प्रयोग का काम आगे बढ़ा। नगर पालिका परिषद मीरजापुर के अध्यक्ष श्यामसुंदर केशरी की ओर से इस शोध पहल और प्रोटोटाइप के निर्माण को प्रोत्साहन एवं सहयोग दिया गया।
विरासत को रोजगार और अर्थव्यवस्था से जोड़ने का प्रयास
नगर पालिका अध्यक्ष श्यामसुंदर केशरी ने कहा कि इस पहल का उद्देश्य केवल प्राचीन नौका की प्रतिकृति बनाना नहीं है। मीरजापुर की पारंपरिक नौका निर्माण कला को पुनर्जीवित कर इसे पर्यटन, कौशल विकास, रोजगार, उद्यमिता और स्थानीय आर्थिक गतिविधियों से जोड़ने की दिशा में प्रयास किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि मीरजापुर और चुनार का नदी परिवहन तथा व्यापार से पुराना संबंध रहा है। गंगा जलमार्ग पर स्थित चुनार ऐतिहासिक रूप से व्यापारिक गतिविधियों का महत्वपूर्ण केंद्र रहा है। ऐसे में स्थानीय नौका निर्माण परंपरा को नए तरीके से सामने लाने से क्षेत्र की ऐतिहासिक पहचान को भी मजबूती मिल सकती है।
शहर के विकास में उद्योग और समाज की भूमिका
फोर्सिस के चेयरमैन कार्तिक केशरी ने कहा कि किसी शहर के विकास की जिम्मेदारी केवल सरकार या प्रशासन की नहीं होती। स्थानीय नागरिकों, उद्यमियों और उद्योग जगत को भी अपने शहर की विरासत, कौशल और आर्थिक विकास में योगदान देना चाहिए। उन्होंने कहा कि पारंपरिक कौशल को आधुनिक शोध और बाजार से जोड़कर स्थानीय समुदायों के लिए रोजगार के नए अवसर तैयार किए जा सकते हैं। मीरजापुर की नौका निर्माण परंपरा भी इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण उदाहरण बन सकती है।
ऐतिहासिक विरासत से भविष्य की संभावनाओं तक
विचार गोष्ठी में आईएनएसवी कौंडिन्य की समुद्री यात्रा और मीरजापुर की पारंपरिक नौका निर्माण तकनीक को एक व्यापक दृष्टिकोण से सामने रखा गया। कार्यक्रम में यह संदेश उभरकर आया कि भारत की प्राचीन तकनीकी विरासत को केवल इतिहास के पन्नों तक सीमित रखने के बजाय शोध, प्रयोग और आधुनिक आवश्यकताओं के साथ जोड़कर उसे नए अवसरों में बदला जा सकता है। मीरजापुर की नौका निर्माण परंपरा पर तैयार किया गया अल्फा प्रोटोटाइप इसी दिशा में एक शुरुआती कदम माना जा रहा है। आने वाले समय में इस तकनीक पर और शोध होने तथा इसे स्थानीय पर्यटन, रोजगार और आर्थिक गतिविधियों से जोड़ने की संभावनाएं भी तलाश की जा सकती हैं।
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