मिर्जापुर संवाददाता संतोष कुमार
सोनभद्र/मिर्जापुर। क्षेत्र से जुड़ी एक सामाजिक-राजनीतिक उपस्थिति के रूप में जानी जाने वाली जिला पंचायत सदस्य कीर्ति कोल हाल ही में एक पारिवारिक समारोह में शामिल होने के कारण चर्चा में रहीं। जानकारी के अनुसार, वर्तमान भारतीय जनता पार्टी के राज्यसभा सांसद अरुण सिंह के चचेरे भाई सुधीर सिंह के निजी निवास पर आयोजित उनके पुत्र के तिलक समारोह में कीर्ति कोल ने शिरकत की। कार्यक्रम में स्थानीय जनप्रतिनिधियों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और क्षेत्र के गणमान्य लोगों की उपस्थिति रही। कीर्ति कोल का नाम क्षेत्रीय राजनीति में लंबे समय से सक्रिय रहा है। वे 96 विधानसभा क्षेत्र से विधायक का चुनाव दो बार लड़ चुकी हैं और दोनों ही बार दूसरे स्थान पर रही हैं। वर्तमान में वे जिला पंचायत सदस्य के रूप में कार्यरत हैं। उनके राजनीतिक जीवन की पृष्ठभूमि भी उल्लेखनीय है—उनके पिता स्वर्गीय भाई लाल कोल पूर्व विधायक एवं एक बार सोनभद्र से सांसद रह चुके थे। स्थानीय स्तर पर यह माना जाता है कि कीर्ति कोल ने अपने पिता की राजनीतिक विरासत और जनसंपर्क शैली को आगे बढ़ाया है।
समारोह के दौरान उपस्थित लोगों ने कीर्ति कोल के जनसरोकारों और सक्रियता की चर्चा की। समर्थकों का कहना है कि वे क्षेत्र में सामाजिक मुद्दों पर लगातार काम करती रही हैं और सुख-दुख के अवसरों पर लोगों के बीच उपस्थित रहती हैं। कई ग्रामीणों और कार्यकर्ताओं ने उन्हें मिलनसार और सहज उपलब्ध जनप्रतिनिधि बताया। हालांकि, राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि चुनावी राजनीति में किसी भी दावे या लोकप्रियता का वास्तविक परीक्षण मतपेटी में ही होता है।स्थानीय राजनीति में कीर्ति कोल की छवि एक सक्रिय महिला जनप्रतिनिधि के रूप में देखी जाती है। क्षेत्र के विकास, शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार जैसे मुद्दों पर उनकी प्राथमिकताओं का उल्लेख अक्सर उनके सार्वजनिक कार्यक्रमों और बैठकों में होता रहा है। उनके निकट सहयोगियों का कहना है कि वे विधानसभा क्षेत्र में आधारभूत सुविधाओं और औद्योगिक अवसरों के विस्तार पर जोर देती हैं।अधिवक्ता कमेश मिश्र सहित कई अन्य सामाजिक-राजनीतिक व्यक्तित्व भी उपस्थित रहे। कार्यक्रम में पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ मेहमानों का स्वागत किया गया और सामुदायिक सौहार्द का वातावरण देखने को मिला। गौरतलब है कि आगामी चुनावों को लेकर क्षेत्र में राजनीतिक हलचल पहले से ही तेज है। विभिन्न दलों और नेताओं की गतिविधियों पर मतदाताओं की नजर बनी हुई है। ऐसे में सार्वजनिक आयोजनों में जनप्रतिनिधियों की उपस्थिति को स्थानीय स्तर पर राजनीतिक संकेतों के रूप में भी देखा जाता है, हालांकि अंतिम निर्णय मतदाताओं के हाथ में ही रहता है।
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