इटली के विवादित PFAS प्लांट की भारत में वापसी? महाराष्ट्र में शुरू हुआ उत्पादन, पर्यावरण और स्वास्थ्य को लेकर उठे सवाल
ABN NEWS 24 | विशेष रिपोर्ट अखंड अवध समाचार सम्पादक विशाल सिंह
नई दिल्ली/महाराष्ट्र। इटली के इतिहास के सबसे बड़े पर्यावरणीय घोटालों में शामिल रहे एक रासायनिक संयंत्र की तकनीक, मशीनरी और पेटेंट अब भारत में नए सिरे से इस्तेमाल किए जा रहे हैं। यह मामला तब चर्चा में आया जब अंतरराष्ट्रीय मीडिया रिपोर्टों में दावा किया गया कि इटली की बदनाम रासायनिक कंपनी मितेनी (Miteni) की संपत्तियां भारतीय कंपनी द्वारा खरीदकर महाराष्ट्र के रत्नागिरी जिले स्थित लोटे परशुराम औद्योगिक क्षेत्र में स्थापित की गई हैं।
यह मामला केवल एक औद्योगिक निवेश तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके साथ पर्यावरण, जल प्रदूषण, सार्वजनिक स्वास्थ्य और औद्योगिक नियमन से जुड़े गंभीर सवाल भी खड़े हो रहे हैं। विशेषज्ञों और पर्यावरण कार्यकर्ताओं का कहना है कि जिस तकनीक और उत्पादन प्रणाली को यूरोप में प्रदूषण के आरोपों के कारण बंद होना पड़ा, उसके भारत में दोबारा शुरू होने की स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच होनी चाहिए।

क्या है पूरा मामला?
इटली के विसेंज़ा क्षेत्र में स्थित मितेनी फैक्ट्री कई दशकों तक पीएफएएस (PFAS) नामक रसायनों का उत्पादन करती रही। पीएफएएस को आमतौर पर “फॉरएवर केमिकल्स” कहा जाता है क्योंकि ये पर्यावरण में अत्यंत लंबे समय तक बने रहते हैं और आसानी से नष्ट नहीं होते।
वर्ष 2011 में वैज्ञानिकों ने इस क्षेत्र के जल स्रोतों में पीएफएएस की अत्यधिक मात्रा दर्ज की। बाद की जांच में आरोप लगे कि वर्षों तक फैक्ट्री से निकलने वाले रसायनों ने भूमिगत जल और पेयजल स्रोतों को प्रभावित किया।
मामला बढ़ने के बाद इटली में बड़े पैमाने पर जांच शुरू हुई और 2018 में कंपनी बंद हो गई। इसके बाद कंपनी के कई पूर्व अधिकारियों पर पर्यावरण प्रदूषण समेत अन्य आरोपों में मुकदमा चलाया गया। जून 2025 में इटली की अदालत ने कुछ पूर्व अधिकारियों को दोषी भी ठहराया और उन्हें जेल की सजा सुनाई।

भारत कैसे पहुंची मितेनी की तकनीक?
मितेनी के दिवालिया होने के बाद उसकी मशीनरी, पेटेंट और उत्पादन संबंधी तकनीकी संपत्तियों की नीलामी की गई। रिपोर्टों के अनुसार भारतीय रासायनिक कंपनी लक्ष्मी ऑर्गेनिक इंडस्ट्रीज की सहायक कंपनी वीवा लाइफसाइंसेज ने 2019 में इन संपत्तियों को खरीद लिया।
इसके बाद इटली से मशीनरी को समुद्री मार्ग से भारत लाया गया। यह उपकरण महाराष्ट्र के रत्नागिरी जिले में स्थित लोटे परशुराम एमआईडीसी क्षेत्र में स्थापित किए गए।
बताया जाता है कि 2023 तक मशीनरी का स्थानांतरण पूरा हो गया था और 2025 की शुरुआत में उत्पादन शुरू कर दिया गया।
आखिर PFAS क्या होते हैं?
PFAS यानी Per- and Polyfluoroalkyl Substances रसायनों का एक बड़ा समूह है, जिसका उपयोग उद्योगों में विभिन्न उत्पादों के निर्माण में किया जाता है।
इनका उपयोग निम्न क्षेत्रों में होता है:
- कीटनाशक निर्माण
- दवा उद्योग
- रंग और पिगमेंट
- इलेक्ट्रॉनिक उपकरण
- कॉस्मेटिक उत्पाद
- जलरोधी और दागरोधी सामग्री
- औद्योगिक कोटिंग
इन रसायनों की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि ये अत्यंत स्थायी होते हैं और प्राकृतिक रूप से आसानी से समाप्त नहीं होते। इसी वजह से इन्हें “फॉरएवर केमिकल्स” कहा जाता है।
स्वास्थ्य पर क्या असर पड़ सकता है?

वैज्ञानिक अध्ययनों में लंबे समय तक PFAS के संपर्क को कई स्वास्थ्य समस्याओं से जोड़ा गया है। हालांकि अलग-अलग रसायनों के प्रभाव अलग हो सकते हैं, लेकिन विभिन्न शोधों में निम्न जोखिमों का उल्लेख मिलता है:
- कुछ प्रकार के कैंसर का बढ़ा जोखिम
- लीवर और किडनी संबंधी समस्याएं
- थायरॉयड विकार
- प्रतिरक्षा प्रणाली पर प्रभाव
- प्रजनन क्षमता में कमी
- बच्चों के विकास पर असर
- हृदय संबंधी रोगों का बढ़ा खतरा
इटली में मितेनी संयंत्र के आसपास रहने वाले लोगों के रक्त में PFAS की अत्यधिक मात्रा पाए जाने की खबरें सामने आई थीं।
प्रभावित लोगों की कहानी
इटली में मितेनी संयंत्र के पूर्व कर्मचारियों और स्थानीय निवासियों ने वर्षों तक इस प्रदूषण के प्रभाव झेलने का दावा किया।
रिपोर्टों के अनुसार एक पूर्व कर्मचारी इलारियो एर्मेटी के रक्त में PFAS का स्तर अत्यधिक पाया गया। उनका कहना है कि जब उन्होंने PFAS से जुड़ी बीमारियों की सूची देखी तो उनमें से कई समस्याएं उन्हें पहले से थीं।
वहीं स्थानीय सामाजिक कार्यकर्ता मिशेला पिकोली ने दावा किया कि उनके बच्चों के रक्त में भी इन रसायनों की मात्रा पाई गई थी। इसके बाद उन्होंने अन्य प्रभावित परिवारों के साथ मिलकर जागरूकता अभियान शुरू किया।
भारत में क्यों बढ़ रही चिंता?
पर्यावरण विशेषज्ञों का कहना है कि भारत में PFAS को लेकर अभी व्यापक नियामक व्यवस्था विकसित नहीं हुई है।
स्वीडिश यूनिवर्सिटी ऑफ एग्रीकल्चरल साइंसेज से जुड़े पर्यावरण रसायन विशेषज्ञ डॉ. रजनीश गौतम के अनुसार भारत में PFAS पर अध्ययन सीमित हैं और अभी तक व्यापक स्तर पर निगरानी प्रणाली विकसित नहीं हो सकी है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि किसी क्षेत्र में PFAS का उत्पादन हो रहा है तो वहां नियमित पर्यावरणीय निगरानी, भूजल परीक्षण और सार्वजनिक स्वास्थ्य सर्वेक्षण आवश्यक हैं।
लोटे परशुराम औद्योगिक क्षेत्र का इतिहास
महाराष्ट्र के रत्नागिरी जिले में स्थित लोटे परशुराम एमआईडीसी राज्य के प्रमुख रासायनिक औद्योगिक क्षेत्रों में गिना जाता है।
इस क्षेत्र में अनेक रासायनिक उद्योग कार्यरत हैं। वर्षों से स्थानीय लोगों और पर्यावरण समूहों द्वारा प्रदूषण को लेकर शिकायतें भी दर्ज कराई जाती रही हैं।
पर्यावरण कार्यकर्ताओं का दावा है कि औद्योगिक अपशिष्ट के कारण स्थानीय नदियों और जल स्रोतों पर प्रभाव पड़ा है। हालांकि उद्योग और प्रशासन समय-समय पर नियमों के पालन का दावा करते रहे हैं।
अपशिष्ट जल संयंत्र पर भी सवाल
लोटे क्षेत्र में एक साझा अपशिष्ट जल उपचार संयंत्र (Common Effluent Treatment Plant) संचालित किया जाता है।
स्थानीय कार्यकर्ताओं का आरोप है कि यह संयंत्र कई बार अपनी क्षमता के अनुरूप कार्य नहीं कर पाता। उनका कहना है कि बिजली कटौती अथवा तकनीकी समस्याओं की स्थिति में प्रदूषित जल के निस्तारण को लेकर चिंता बनी रहती है।
हालांकि संबंधित एजेंसियों द्वारा समय-समय पर निरीक्षण और सुधारात्मक कार्रवाई किए जाने की बात भी सामने आती रही है।
कंपनी की क्या रणनीति रही?
उद्योग जगत से जुड़े दस्तावेजों के अनुसार भारतीय कंपनी ने मितेनी की तकनीकी विशेषज्ञता और बाजार हिस्सेदारी का लाभ उठाने की रणनीति बनाई थी।
बताया जाता है कि कंपनी ने अंतरराष्ट्रीय ग्राहकों के लिए रसायनों के नमूने भी भेजे ताकि गुणवत्ता अनुमोदन प्राप्त किया जा सके।
विश्लेषकों का कहना है कि फ्लोरोकेमिकल्स का वैश्विक बाजार लगातार बढ़ रहा है और कई उद्योगों में इनकी मांग बनी हुई है। ऐसे में इस क्षेत्र में निवेश को व्यावसायिक दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
यूरोप में क्या हो रहा है?
यूरोपीय संघ PFAS रसायनों को लेकर लगातार सख्त रुख अपना रहा है।
यूरोपीय रसायन एजेंसी हजारों PFAS रसायनों के उपयोग और निर्माण पर व्यापक प्रतिबंध लगाने के प्रस्तावों की समीक्षा कर रही है।
पर्यावरण विशेषज्ञों का कहना है कि यदि यूरोप में नियम सख्त होते हैं तो कई कंपनियां उत्पादन को उन देशों की ओर स्थानांतरित कर सकती हैं जहां नियामक ढांचा अपेक्षाकृत कमजोर है।
क्या भारत में पर्याप्त नियम हैं?
भारत में पर्यावरण संरक्षण के लिए अनेक कानून और संस्थागत व्यवस्थाएं मौजूद हैं। लेकिन PFAS को लेकर अभी विशिष्ट और व्यापक नियमन विकसित होने की आवश्यकता महसूस की जा रही है।
विशेषज्ञों के अनुसार निम्न कदम महत्वपूर्ण हो सकते हैं:
- राष्ट्रीय स्तर पर PFAS निगरानी कार्यक्रम
- पेयजल में PFAS परीक्षण
- औद्योगिक उत्सर्जन मानक
- नियमित पर्यावरणीय ऑडिट
- प्रभावित क्षेत्रों में स्वास्थ्य सर्वेक्षण
- स्वतंत्र वैज्ञानिक अध्ययन
पर्यावरण कार्यकर्ताओं की मांग
पर्यावरण समूहों का कहना है कि महाराष्ट्र स्थित संयंत्र के संचालन, उत्सर्जन और अपशिष्ट प्रबंधन की स्वतंत्र जांच होनी चाहिए।
वे चाहते हैं कि:
- संयंत्र के आसपास भूजल की नियमित जांच हो
- जल स्रोतों में PFAS की निगरानी हो
- स्थानीय समुदायों को जानकारी उपलब्ध कराई जाए
- स्वास्थ्य प्रभावों पर दीर्घकालिक अध्ययन कराया जाए
उद्योग और पर्यावरण के बीच संतुलन की चुनौती
भारत तेजी से औद्योगिक विकास की दिशा में आगे बढ़ रहा है। रासायनिक उद्योग रोजगार, निर्यात और निवेश के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जाता है।
लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि आर्थिक विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन बनाए रखना उतना ही आवश्यक है।
यदि किसी औद्योगिक गतिविधि से दीर्घकालिक पर्यावरणीय जोखिम जुड़ा हो तो उसके लिए पारदर्शी निगरानी और जवाबदेही सुनिश्चित की जानी चाहिए।
निष्कर्ष
इटली की विवादित मितेनी फैक्ट्री की तकनीक और मशीनरी का भारत पहुंचना केवल एक कारोबारी सौदा नहीं बल्कि पर्यावरणीय नीति, औद्योगिक नियमन और सार्वजनिक स्वास्थ्य से जुड़ा महत्वपूर्ण विषय बन गया है।
एक ओर उद्योग इसे निवेश और उत्पादन क्षमता बढ़ाने का अवसर मान रहा है, वहीं दूसरी ओर पर्यावरणविद् और वैज्ञानिक संभावित जोखिमों को लेकर चेतावनी दे रहे हैं।
आने वाले वर्षों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि भारत इस उभरती चुनौती का सामना किस प्रकार करता है और क्या PFAS जैसे स्थायी रसायनों के संबंध में मजबूत नियामक ढांचा विकसित किया जाता है या नहीं।
AI PHOTO
यह रिपोर्ट The Guardian में प्रकाशित खोजी रिपोर्ट पर आधारित है। ABN News 24 ने इसका हिंदी रूपांतरण एवं प्रस्तुतीकरण किया है।)
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इस शोध को जर्नलिज्मफंड यूरोप और आईजे4ईयू का सहयोग प्राप्त था। इस the guardianयह खोजी रिपोर्ट ब्रिटिश समाचार पत्र The Guardian में प्रकाशित हुई थी। इस शोध को Journalismfund Europe और IJ4EU (Investigative Journalism for Europe) का सहयोग प्राप्त था। रिपोर्ट अंतरराष्ट्रीय खोजी पत्रकारों की टीम द्वारा तैयार की गई है, जिसमें इटली की मितेनी कंपनी की मशीनरी, पेटेंट और PFAS उत्पादन से जुड़े कारोबार के भारत में स्थानांतरण की पड़ताल की गई है।