जम्मू-कश्मीर में वंदे मातरम् को लेकर शुरू हुआ विवाद अब INDIA गठबंधन के भीतर राजनीतिक खींचतान का रूप लेता नजर आ रहा है। जम्मू-कश्मीर में आयोजित इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल के उद्घाटन समारोह में वंदे मातरम् के पूरे छह अंतरों का गायन हुआ, जिसके बाद कांग्रेस और उसकी सहयोगी नेशनल कॉन्फ्रेंस के बीच मतभेद खुलकर सामने आने लगे हैं। मामला सिर्फ एक गीत के गायन तक सीमित नहीं रहा, बल्कि अब सवाल यह उठ रहा है कि क्या राष्ट्रीय प्रतीकों को लेकर विपक्षी गठबंधन के दलों की सोच एक जैसी है?
विवाद उस वक्त और गहरा गया जब कांग्रेस महासचिव केसी वेणुगोपाल ने नेशनल कॉन्फ्रेंस से अपने फैसले पर पुनर्विचार करने की अपील की। उन्होंने कहा कि विपक्षी INDIA ब्लॉक के कार्यक्रमों में वंदे मातरम् को केवल पहले दो अंतरों तक सीमित रखा जाना चाहिए। कांग्रेस का तर्क है कि गीत के बाद के अंतरों में हिंदू धार्मिक प्रतीकों का उल्लेख मिलता है और इसलिए पूर्ण संस्करण भारत के समन्वयवादी तथा बहुलतावादी चरित्र के अनुरूप नहीं माना जाना चाहिए।
कांग्रेस के इस रुख के बाद अब पार्टी से ही सवाल पूछे जाने लगे हैं। सबसे बड़ा सवाल यह है कि अगर वंदे मातरम् का पूरा संस्करण इतना आपत्तिजनक है, तो कांग्रेस के अपने नेता और मुख्यमंत्री अतीत में इसके पूर्ण संस्करण के गायन के दौरान मौजूद क्यों रहे? इसी सवाल को नेशनल कॉन्फ्रेंस के नेताओं ने कांग्रेस के सामने रखा है।
नेशनल कॉन्फ्रेंस नेता तनवीर सादिक ने कांग्रेस के रुख पर सवाल उठाते हुए कुछ ऐसे वीडियो साझा किए हैं, जिनमें तेलंगाना के मुख्यमंत्री ए. रेवंत रेड्डी और कर्नाटक के मुख्यमंत्री डीके शिवकुमार वंदे मातरम् के पूर्ण संस्करण के दौरान मौजूद और सम्मान में खड़े दिखाई देते हैं। इन वीडियो के जरिए नेशनल कॉन्फ्रेंस ने कांग्रेस से पूछा है कि अगर पार्टी पूर्ण संस्करण को लेकर आपत्ति जता रही है, तो फिर अपने ही मुख्यमंत्रियों के सार्वजनिक कार्यक्रमों में नजर आए इस आचरण पर कांग्रेस की क्या राय है?
यहीं से अब्दुल्ला पिता-पुत्र की भूमिका भी चर्चा में आ गई है। नेशनल कॉन्फ्रेंस के वरिष्ठ नेता फारूक अब्दुल्ला और उनके बेटे उमर अब्दुल्ला की पार्टी कांग्रेस के साथ INDIA गठबंधन का हिस्सा है, लेकिन वंदे मातरम् के मुद्दे पर दोनों दलों के बीच विचारों में अंतर दिखाई दे रहा है। नेशनल कॉन्फ्रेंस की ओर से कांग्रेस के रुख पर सवाल उठाना इस बात का संकेत माना जा रहा है कि गठबंधन के भीतर राष्ट्रीय प्रतीकों और राजनीतिक मुद्दों पर पूरी सहमति नहीं है।
मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि कांग्रेस कार्यसमिति ने 19 अगस्त 2026 को फैसला किया था कि पार्टी के कार्यक्रमों में वंदे मातरम् के केवल पहले दो अंतरे गाए जाएंगे। कांग्रेस ने अपने इस फैसले के पीछे 1937 में लिए गए पार्टी के एक पुराने निर्णय का हवाला दिया है। पार्टी का कहना है कि ऐतिहासिक संदर्भ को देखते हुए पहले दो अंतरों को ही कार्यक्रमों में इस्तेमाल किया जाना चाहिए।
लेकिन अब नेशनल कॉन्फ्रेंस कांग्रेस से यह पूछ रही है कि जब पार्टी ने यह फैसला लिया है, तो क्या उसके सभी नेता और मुख्यमंत्री भी उसी नीति का पालन कर रहे हैं? यही सवाल राजनीतिक विवाद को और ज्यादा हवा दे रहा है। सोशल मीडिया पर सामने आए वीडियो और नेताओं के बयानों ने कांग्रेस के लिए असहज स्थिति पैदा कर दी है।
विपक्षी गठबंधन के सामने अब एक बड़ी चुनौती यह भी है कि वह अपने घटक दलों के बीच ऐसे संवेदनशील मुद्दों पर एकराय कैसे बनाए। वंदे मातरम् सिर्फ एक गीत नहीं, बल्कि भारत के स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़ा एक महत्वपूर्ण राष्ट्रीय प्रतीक रहा है। इसलिए इसके गायन को लेकर होने वाली राजनीतिक बहस सीधे तौर पर भावनाओं और राष्ट्रवाद से जुड़ जाती है।
फिलहाल विवाद का केंद्र यही सवाल है कि वंदे मातरम् के पूर्ण संस्करण को लेकर कांग्रेस का रुख कितना सुसंगत है और क्या गठबंधन के दूसरे दल इस रुख से सहमत हैं। नेशनल कॉन्फ्रेंस की ओर से उठाए गए सवालों के बाद कांग्रेस को अब अपने नेताओं के पुराने सार्वजनिक आचरण और मौजूदा पार्टी फैसले के बीच अंतर को लेकर जवाब देना पड़ सकता है। ऐसे में देखना होगा कि आने वाले दिनों में यह विवाद केवल बयानबाजी तक सीमित रहता है या INDIA गठबंधन के भीतर राजनीतिक दूरी को और बढ़ाता है।
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